तत्त्वमसि के अनुसार परमात्मा और देवताओं के प्रति
त्वम् शब्द का प्रयोग उचित है परन्तु लौकिक व्यवहार में जो लोग अपने सम्मान योग्य लोगों के प्रति
नमस्ते कहकर अभिवादन करते हैं वे वस्तुतः उनका अपमान कर रहे होते हैं। इसे महाभारत के निम्नलिखित प्रसंग के आधार पर समझिए -
📜 महाभारत – कर्णपर्व से -
१. युधिष्ठिर का अर्जुन से कथन (कर्णपर्व 57.30–32)
> अहो अर्जुन माहात्म्यं व्यर्थं ते विफलं कृतम्।
यत् त्वं न हन्तुं शक्नोषि कर्णं शत्रुजनं रणे॥
यदि न शक्नोषि कर्णं त्वं हन्तुं धनञ्जय।
देहि मे गांडीवं राजन् यथाहं तं निपातयेम्॥
(अर्थ:) “अर्जुन! तुम्हारा पराक्रम व्यर्थ गया — तुम कर्ण को मार नहीं सके। यदि नहीं कर सकते, तो अपना गांडीव मुझे दे दो।”
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२. अर्जुन का क्रोध (कर्णपर्व 58.4–5)
> स श्रुत्वा परुषं वाक्यं धर्मराजेन भारत।
रोषेण महताऽऽविष्टो धनञ्जय उवाच ह॥
प्रतिज्ञां मे स्मरन् वीरः प्राद्रवद्धनुराददे।
यो मे गांडीवं निन्देत स मया निहतः क्षणात्॥
(अर्थ:) “अर्जुन ने यह सुनकर क्रोध से धनुष उठा लिया — याद आया कि जिसने मेरे गांडीव का अपमान किया, उसका वध मैं करूँगा।”
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३. श्रीकृष्ण का उपदेश (कर्णपर्व 58.6–9)
> तं विलोक्य जनार्दनः प्रहसन् वाक्यमब्रवीत्।
न तात ब्रह्मबन्धूनां भ्रातॄणां वा वधोऽनघ।
तस्मात् त्वया वधार्थं हि वाच्यः क्रूरतरैः पदैः।
त्वं इति प्रोक्तं भ्रातरं वधसदृशमिष्यते॥
(अर्थ:) “हे अर्जुन! ब्राह्मण या भ्राता का वध धर्मसम्मत नहीं। इसलिए तुम उसे कठोर वचन कहो — उसे ‘त्वम्’ कहकर संबोधित करना ही उसके वध के समान माना जाएगा।”
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४. अर्जुन का ‘त्वम्’ प्रयोग (कर्णपर्व 58.10–11)
> त्वं धर्मराज सन्देहं कृतवान् मम संहरेः।
अहं त्वां नाभिभाषेयं यदि न स्याद् जनार्दनः॥
(अर्थ:) “हे धर्मराज! तूने मेरा अपमान किया है — यदि श्रीकृष्ण न होते तो मैं तुझसे कभी बात न करता।”
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५. युधिष्ठिर की शान्ति और समापन (कर्णपर्व 59.12)
> शमं प्राप्तौ ततः भ्रातरौ, हृष्टौ च मधुसूदनः।
पुनश्च युद्धं प्रवृत्तं तयोः संहृष्टचेतसोः॥
(अर्थ:) “फिर दोनों भ्राता शांत हो गए, और श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए। तत्पश्चात वे पुनः युद्ध में प्रवृत्त हुए।”
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ज्ञानसागरमिव तत्। धन्यवादः भवते एतदर्थम्।