अथ तत्र अनवरतदीर्घजागरदह्यमानतैलप्रदीपशिखाकज्जलमलीमसैः प्रलयसमयसमुदितपयोदपटलान्धकारबन्धुरैः स्निग्धाञ्जनरागैः समालिखितपरिसरम्।
अध्वरकुण्डमध्यपतितहव्यवाहसन्तप्तघृतधारानुकारिपिङ्गलकाञ्चनद्रवविभ्रमदायितारामण्डलम्।
अनेककल्पसहस्रपरिवर्तनसाक्षिशीर्णबालुकापाषाणचैत्यस्तूपधूलिधूसरितगङ्गातीरप्रधावितमहारथचक्रनिर्घोषस्मृतिगर्भितम्।
अभिनवस्नानार्द्रदेवतायतनाभ्यन्तरगर्भितशिलातलनिःश्वसितसान्द्रघनसारसौरभवासितम्।
स्वेदसलिलसंसक्तचीनांशुकमिव सर्वगात्रेषु लग्नेनौष्ण्येन कवलितम्।
अनन्तजन्मकर्मविपाकऋणभाण्डागाररक्षिभिरिव नगरगोपुरद्वारलोहार्गलदण्डकठिनैः दीर्घपक्ष्मशूलैरुपरुद्धमार्गम्।
प्राक्काललिखितताम्रपट्टशासननियन्त्रितमिव सकललोकं निश्चलीकुर्वत्।
पीयूषोत्पत्तिसमयोद्यतदुग्धसिन्धुसन्निभं बहिरत्यन्तप्रशान्तमपि अभ्यन्तरप्रवृत्ततुमुलावनिर्दारणदारुणसंक्षोभं स्तब्धमपि विवर्तमानं किमपि दिव्यं दुःसहं नयनयुगलमासीत्॥
हिंदी अनुवाद -
तब वहाँ एक ऐसी अलौकिक, असह्य नेत्र-जोड़ी थी —
जिनकी चारों ओर की कोरें चमकदार गाढ़े काजल से रंगी हुई थीं, जो निरन्तर दीर्घ जागरणों में जलते तेल-दीपकों की लौओं के धुएँ से मैली होकर प्रलयकाल के उमड़े मेघ-समूहों जैसे प्रिय अन्धकार से भरी हुई थीं;
जिनकी प्रिय पुतली-मण्डल सुनहरी चमक वाली थी, मानो यज्ञ-कुण्ड के बीच में गिरी हुई अग्नि से तप्त घी-की धारा की नकल करती हुई पिघले हुए सोने की भ्रान्ति दे रही हो;
जो गंगा-तट की उस धूल से धूसरित थीं जो असंख्य कल्पों के चक्र के साक्षी रहे टूटे-फूटे बालुका-पाठिन, चैत्य और स्तूपों की धूल से सनी थी तथा जिनमें कभी उस तट पर दौड़ते महारथों के चक्रों के गम्भीर घोष की स्मृति गर्भित थी;
जो नये स्नान से भीगे देवालय के भीतरी गर्भगृह के पाषाण-फर्श से निकली हुई सघन, गहन चन्दन-सुगन्ध से अन्तःस्थल तक सुवासित थीं;
जो पसीने से भीगे चीनांशुक की तरह समस्त अंगों में चिपके हुए उष्मा से मानो निगली जा रही थीं;
जिनका मार्ग उन दीर्घ पलकों से अवरुद्ध था जो नगर-द्वार के लौह-अर्गल-दण्डों जैसी कठोर थीं — ठीक वैसे ही जैसे अनन्त जन्मों के कर्म-विपाक के ऋण-भाण्डार के रक्षक;
जो प्राचीन काल में लिखे गए ताम्रपत्र-शासन की तरह सम्पूर्ण लोक को स्थिर, निश्चल बना देती थीं;
जो अमृत-उत्पत्ति के समय मथने को उद्यत क्षीर-सागर जैसे थे — बाहर से अत्यन्त शान्त, किन्तु भीतर पृथ्वी फोड़ देने वाले भयंकर संक्षोभ से भरे, स्तब्ध-से होते हुए भी निरन्तर विवर्तमान —
वह एक अलौकिक, असहनीय नेत्र-युगल था॥
English translation -
There existed then a certain divine, unbearable pair of eyes —
whose surroundings were painted with glossy collyrium-black, soiled by the soot of lamp-flames from oil burned in unending long vigils, akin to the dear darkness of cloud-masses arisen at the hour of cosmic dissolution;
whose beloved iris-circle bestowed the illusion of molten gold — tawny, imitating the heated ghee-streams of the oblation-fire that has fallen into the midst of the sacrifice-pit;
made grey with the dust of the Ganga bank — rendered greyish by crumbled sand and stones, caityas and stūpas that have witnessed the turning of many thousands of kalpas, and by the thunderous memory of great chariots that once raced along it;
perfumed inwardly with the dense, intense fragrance of pure essence exhaled from the stone floor of the god’s fresh-bathed temple;
devoured by a heat that clung to every limb like sweat-soaked Chinese silk;
whose path was barred by long eyelashes hard and unyielding as the iron bolts and bars of city-gate towers — those very keepers of the treasure-house of karmic debts accumulated through endless births;
that made the entire world motionless, as though bound by an ancient copper-plate royal grant inscribed in former times;
resembling the Milk Ocean at the moment of rising for the churning of ambrosia — utterly tranquil without, yet within raging with the dreadful, earth-splitting tumult of churning — motionless yet revolving —
a certain divine, unbearable pair of eyes.
इदं न कस्यापि विशिष्टग्रन्थस्य अंशः, अपि तु 'ऋणानुबन्धः' इति भावम् अधिकृत्य रचितं स्वतन्त्रं शब्दचित्रम्।
यदा जन्मान्तर-संस्कारेण बद्धः कश्चित् जनः अकस्मात् सम्मुखं आयाति, तदा तस्य नेत्रयोः यः अगाधः इतिहासः, वेदना, शान्तिः च दृश्यते, तस्यैव इदं वर्णनम् अस्ति॥
अस्य वर्णनस्य स्वरूपे एव एका जिज्ञासा प्रसूता इव दृश्यते।
निरन्तरजागरणेन, धूमलिप्तदीपप्रभया, मलिनजलनिर्यासैः,
अत्यन्तक्लान्तमानस-वस्तुसंघटनैः च निर्मितंम् इदं दृश्यचित्रम्—
किं केवलं सामाजिकवास्तविकताया: चित्रणम्,
उत मानवजीवनस्य ‘ऋणानुबन्ध’ इति सूक्ष्मतत्त्वस्य निदर्शनम्?
श्रमेण क्लेशेन च आवृतः जनः
यथार्थं पश्यति, उत प्रपञ्चस्य मायाव्याप्तं विवर्तम् केवलं अनुभवति?
प्रभातकाले सर्वाणि शान्तिम् उपयान्ति इति यत् उक्तम्—
किं तद् बाह्यजगतः परिवर्तनम्,
उत अन्तर्मनसि एव शान्तेः उदयो भवति?
तर्हि,
दृश्यं दुःखं प्रकटयति, उत दुःखस्य मूलं द्योतयति?
किं ‘ऋणानुबन्धः’ इति वस्तुतः मनोवैज्ञानिकः बन्धनः,
उत अदृश्याधिष्ठानस्य किञ्चित् दार्शनिकं रहस्यम्?
मम शब्दाः तु केवलं शरीरम्, परन्तु भवतां गभीरा व्याख्या तत्र प्राणप्रतिष्ठां करोति।
यत् पृष्टं तस्य उत्तरम् इदमेव—
इदं न केवलं सामाजिकं दृश्यम्, अपि तु अनन्त-संस्कारैः बद्धस्य जीवस्य साक्षिरूपं सत्यम्। बाह्यः क्लेशः 'ऋणस्य' भारः, अन्तःस्थिता शान्तिः तु आत्मनः स्वरूपम्। एतयोः सन्धिस्थलमेव सः 'दृष्टिपातः' अस्ति।
भवतां विचारेण मम लेखनं पूर्णताम् अगात्। धन्यवादाः॥