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    Vimal Kumar Pandey (विमलकुमारपाण्डेयः) Public
    ११/२४/२०२५, २:०२:४७ अ (11/24/2025, 2:02:47 PM)
    श्रीतुलसीदासेन विरचितः रामचरितमानसग्रन्थः अत्यन्तं लोककल्याणकरः, आत्मज्ञानप्रदः तथा प्रसिद्धः मार्गदर्शकः अभूतपूर्वश्च ग्रन्थः वर्तते । मनुष्यस्य साध्वसाधुलक्षणम् एकत्र एवम् उल्लिखितमस्ति -

    संत सहहिं दुख परहित लागी ।
    पर दुख हेतु असंत अभागी ।।
    भूर्ज तरू सम संत कृपाला ।
    परहित निति सह विपति बिसाला ।।

    सन इव खल पर बंधन करई ।
    खाल कढाइ बिपति सहि मरई ।।
    खल बिनु स्वारथ पर अपकारी ।
    अहि मूषक इव सुनु उरगारी ।।

    पर संपदा बिनासि नसाहीं ।
    जिमि ससि हति हिम उपल बिलांही ।।
    दुष्ट उदय जग आरति हेतू ।
    जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ।।
     --- इत्यादयः ।
    तस्मात् स्वकल्याणाय मानसस्य दैनिकपाठमननादिकम् अत्यन्तम् आवश्यकम् इति ।
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    सुमन्तमण्डलःPublic
    ११/२४/२०२५, ५:१२:१७ अ (11/24/2025, 5:12:17 PM)
    अति सुन्दर प्रस्तुति! तुलसीकृत ये भाव सच में मन को स्पर्श करते हैं। संत और असंत के स्वभाव का जो सूक्ष्म विवेचन है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है। पढ़कर मन में एक अद्भुत शांति आ गई।
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