एकदा दूरस्थे वनप्रदेशे एकः वृद्धः वानरः निवसति स्म। स अद्यतनयुववानरैः सह न क्रीडितुं शक्नोति, किन्तु तेषां कल्याणाय सदा चिन्तां करोति स्म। तस्मिन्नेव वने एकः सिंहः दुर्बुद्धिः स्वार्थलोलुपश्च आसीत्। स सर्वान् जन्तून् भयभीतान् कृत्वा स्वराज्यं स्थापयितुं चेष्टते स्म।
एकदा सिंहः सर्वान् वानरान् आहूतवान्— “यः मम सेवां करिष्यति, तं रक्षामि।” इति। सर्वे वानराः भयेन मौनम् आस्थाय स्थिताः। केवलं वृद्धवानरः अग्रे आगत्य सिंहं प्राह— “राजन्, भयस्य आधारः विश्वासस्य नाशः अस्ति। यदि त्वं केवलं स्वार्थं पश्यसि, तर्हि त्वं राज्ञः नाम्ना योग्यः न।”
सिंहः क्रुद्धः अभवत्, किन्तु वृद्धवानरस्य धैर्यं तस्य मनः स्पृष्टवान्। स चिन्तयामास— “अहं बलवान् अस्मि, किन्तु बुद्धेः मार्गदर्शनं विना किञ्चित् अपि न शक्नोमि।”
ततः सिंहः सर्वान् प्राणिनः समाहूय उक्तवान्— “यथार्थं मार्गं दर्शयितुं मम वृद्धमित्राय नमः। आरभ्यामह इदानीं वनस्य रक्षणम्, न तु भयस्य विस्तारम्।”
एवं तस्मिन् वने पुनः शान्तिः प्रवृत्ता।
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एक बार दूर के वन क्षेत्र में एक बूढ़ा बंदर रहता था। वह युवा बंदरों के साथ खेल नहीं पाता था, पर उनकी भलाई के लिए हमेशा सोचता रहता था। उसी वन में एक स्वार्थी और दुराचारी सिंह भी था, जो सभी जानवरों को डराकर अपना राज्य स्थापित करना चाहता था।
एक दिन सिंह ने सभी बंदरों को बुलाकर कहा— “जो मेरी सेवा करेगा, मैं उसे सुरक्षा दूँगा।” सभी बंदर डरकर चुप रहे। तभी बूढ़ा बंदर आगे आया और बोला— “राजन, भय का आधार विश्वास का नाश है। यदि आप केवल अपना लाभ देखते हैं, तो आप राजा कहलाने योग्य नहीं।”
सिंह क्रोधित हुआ, पर बूढ़े बंदर का साहस उसके मन को छू गया। उसने सोचा— “मेरे पास बल है, पर बिना बुद्धि के मैं कुछ नहीं कर सकता।”
फिर उसने सभी जानवरों को बुलाकर कहा— “सही मार्ग दिखाने के लिए मेरे वृद्ध मित्र को प्रणाम। अब से हम भय नहीं फैलाएँगे, बल्कि वन की रक्षा करेंगे।”
और इस प्रकार वन में फिर से शान्ति स्थापित हुई।