अथ क्रमेण गगनाङ्गण-गलित-दिवसकर-कर-निकरे, यत्र प्रतीची-दिग्वधू-मुखं कुङ्कुम-पराग-पिञ्जरितमिव दृश्यते, तस्मिन् सन्ध्यासमये, यदा हि विरहिणीनां हृदये मन्मथ-हुताशनो मन्दं मन्दं प्रज्वलति, तदा काचित् पूर्वं सकल-भुवन-मोहन-रूप-लावण्य-वती, इदानीं तु विगलित-विषय-विषा, श्रीनन्दनन्दन-चरणारविन्द-मकरन्द-लुब्ध-मधुकरीव एकाकिनी निभृत-निकुञ्ज-सदृशे अन्तःपुर-प्रांगणे समुपविष्टा बभूव॥ १॥
सा खलु पुरा अनेक-नरपति-किरीट-कोटि-विघृष्ट-चरण-पीठा, साम्प्रतं तु केवलं श्यामसुन्दर-स्मरण-संजीवनी। तस्याः शरीर-यष्टिः, या पुरा मदलस-गामिनी मदन-मोहिनी च आसीत्, सा अधुना शरदिन्दु-किरण-धवल-दुकूल-संवृता, कालिन्दी-लहरी-फेन-पुञ्ज-पाण्डुरा, श्रीकृष्ण-विरह-व्रत-कृशाङ्गी जाता। यथा हि महाकाल-पुरी-श्मशाने भस्म-भूषितं वैराग्यं, तथैव तस्याः गात्रे श्वेत-वसनं शोभते, यत् खलु रास-विलासे गोपीनां विश्रस्त-केश-पाश-गलित-कुसुम-मालिकावत् पवित्रं प्रतिभाति॥ २॥
तस्याः वदन-कमलं न हसति न रोदिति, अपि तु निवात-निष्कम्प-दीपकलिका इव, योग-निद्रा-गतस्य नारायणस्य नाभिपद्ममिव निश्चलम्। तत्र न कश्चित् विकारः, केवलं गम्भीर-भाव-सागर-निमग्ना शान्तिः। कण्ठ-देशे च लुलिता एकावली मुक्ता-माला, या हि दक्षिण-सागरस्य घनीभूत-बाष्प-बिन्दुरिव, नयन-गलित-विरह-वारि-धारयेव रचिता, तस्याः ताप-तप्त-हृदयं शीतलयितुं यतमाना लक्ष्यते॥ ३॥
तस्याः कर-किसलयं, यत् पुरा ललित-ललित-मुद्रा-विलासैः रसिक-जन-चित्त-हरिण-बन्धन-पाशः आसीत्, तत् इदानीं हिमानी-हत-नलिनी-दल-वत्, शीतलं निष्पन्दं च सत्, स्व-क्रोडे उत्तानं वर्तते। तौ पाणी कस्मैचित् अदृश्य-बालकाय—यः खलु व्रज-धूलि-धूसरित-कुन्तलः, मयूर-पिच्छ-मुकुटः, मन्द-स्मित-सुधामधुरः बाल-गोपालः—तस्मै आत्म-समर्पण-मुद्रया स्थितौ। तस्याः शून्ये अङ्के स एव "अदृश्य-किशोरः" भाव-नेत्रेण दृश्यमानः, यस्य वियोग एव परमः संयोगः॥ ४॥
परितश्च मलयज-चन्दन-परिमलः शुष्क-चम्पक-गन्धश्च प्रसरति, यो हि तस्याः काम-गन्ध-शून्यस्य शुद्ध-वात्सल्य-भावस्य सौरभमिव। एवं सा वरवर्णिनी, स्वकीय-रूप-यौवन-मदं सर्वं श्रीकृष्ण-चरणे होम-द्रव्यमिव हुत्वा, कामाग्निं निर्वाप्य प्रेमानल-ज्वालां प्रज्वाल्य, साक्षात् मूर्तिमती विरह-तपस्या इव, अन्तःस्थित-बालकृष्ण-दर्शन-लालसा, निज-हृदय-वृन्दावने निभृतं राजते॥ ५॥
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हिन्दी अनुवाद
१. तदनन्तर, जब आकाश रूपी आँगन से सूर्य की किरणें धीरे-धीरे विदा हो रही थीं और पश्चिम दिशा रूपी वधू का मुख केसर के पराग से रंगा हुआ (सुनहरा-लाल) प्रतीत हो रहा था; उस सन्ध्या बेला में, जब विरहिनियों के हृदय में कामदेव की अग्नि मन्द-मन्द सुलगने लगती है—तब, वह स्त्री, जो कभी सम्पूर्ण त्रिभुवन को अपनी रूप-राशि से मोहित करती थी, किन्तु अब जिसका विषय-वासना रूपी विष उतर चुका है; वह श्रीनन्दनन्दन (कृष्ण) के चरण-कमलों के मकरन्द की लोभी भ्रमरी की भाँति, अकेली उस एकान्त कुंज-सदृश अन्तःपुर के आँगन में आ बैठी।
२. वह, जिसके चरण-पादुकाएं (पाद-पीठ) कभी अनेक राजाओं के मुकुटों की नोक से घिस जाती थीं, वह आज केवल श्यामसुन्दर की स्मृति के सहारे जीवित है। उसकी देह-यष्टि, जो कभी मदालस (गर्व और विलास से पूर्ण) और मदन-मोहिनी थी, वह अब शरद-ऋतु के चन्द्रमा की किरणों जैसे श्वेत रेशमी वस्त्र से ढकी हुई, यमुना की लहरों के फेन-समूह जैसी पाण्डुर (पीली/सफेद) और श्रीकृष्ण के विरह-व्रत से अत्यंत क्षीण हो गई है। जैसे महाकाल की नगरी (उज्जैन) के श्मशान में भस्म से विभूषित 'वैराग्य' शोभा पाता है, वैसे ही उसके शरीर पर वह श्वेत वस्त्र सुशोभित हो रहा है; जो रास-लीला में गोपियों के खुले हुए केश-पाश से गिरे हुए पुष्प-हार की भाँति पवित्र प्रतीत होता है।
३. उसका मुख-कमल न हँसता है, न रोता है; अपितु वह निर्वात स्थान में रखी हुई निश्चल दीपक की लौ के समान, और योग-निद्रा में लीन भगवान नारायण के नाभि-कमल की भाँति स्थिर है। वहाँ कोई विकार नहीं है, केवल गम्भीर भाव-सागर में डूबी हुई शान्ति है। उसके कंठ में झूलती हुई मोतियों की एकावली (माला) ऐसी लगती है मानो दक्षिण सागर की घनीभूत भाप की बूँद हो, या नयनों से बहती हुई विरह की जल-धारा से ही रची गई हो, जो उसके ताप-तप्त हृदय को शीतलता प्रदान करने का प्रयास कर रही हो।
४. उसका कर-किसलय (कोमल हाथ), जो कभी अपनी ललित मुद्राओं के विलास से रसिक जनों के चित्त रूपी हिरण को बाँधने का पाश (जाल) था, वह अब हिमपात (बर्फ) से आहत कमलिनी के पत्ते की भाँति शीतल और स्पन्दन-हीन होकर उसकी गोद में सीधा (उत्तान) पड़ा है। वे दोनों हाथ किसी अदृश्य बालक के लिए—वही बाल-गोपाल जिसके बाल ब्रज की धूल से सने हैं, जिसके सिर पर मयूर-पंख है और जो अपनी मन्द-मुस्कान की सुधा बरसा रहा है—उसी के प्रति आत्म-समर्पण की मुद्रा में स्थित हैं। उसकी सूनी गोद में वही "अदृश्य किशोर" भाव-नेत्रों से दिखाई दे रहा है, जिसका वियोग ही (भक्त के लिए) परम संयोग है।
५. चारों ओर मलयज चन्दन की सुगन्ध और सूखे चम्पा के फूलों की गंध फैल रही है, जो मानो उसके काम-गंध से रहित शुद्ध वात्सल्य भाव की सौरभ है। इस प्रकार वह श्रेष्ठ सुन्दरी, अपने रूप और यौवन के सम्पूर्ण मद को श्रीकृष्ण के चरणों में हवन-सामग्री की तरह होम करके, काम की अग्नि को बुझाकर और प्रेम की ज्वाला को प्रज्वलित कर, साक्षात् मूर्तिमान विरह-तपस्या की भाँति, अपने हृदय रूपी वृन्दावन में स्थित बालकृष्ण के दर्शन की लालसा लिए, निभृत (शांत भाव से) सुशोभित हो रही है।
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English Translation
* Then, gradually, as the multitude of sunbeams slipped away from the courtyard of the sky, and the face of the Bride of the West appeared as if dusted with saffron pollen; at that twilight hour—when the fire of Cupid burns slowly within the hearts of separated lovers—she sat down. Once, she possessed a beauty that enchanted the entire world; but now, having shed the poison of worldly desires, she sat alone in the courtyard of the inner palace, which resembled a silent grove, like a female bee greedy only for the nectar of the lotus feet of the son of Nanda (Krishna).
* She, whose footstool was once worn smooth by the edges of the crowns of countless kings, is now sustained only by the life-giving memory of the dark-hued Lord (Shyamasundara). Her slender frame, which once moved with the languor of pride and captivated Cupid himself, is now wrapped in silk as white as the autumn moon. She has become pale like the foam on the waves of the Yamuna and emaciated by the vow of separation from Sri Krishna. Just as ash-adorned Renunciation shines in the cremation grounds of the city of Mahakala, so does the white garment grace her body—appearing as holy as a garland of flowers slipped from the loosened hair of the Gopis during the divine Rasalila.
* Her lotus-face neither laughs nor cries; rather, it is motionless like a lamp-flame in a windless place, or like the navel-lotus of Narayana deep in yogic sleep. There is no disturbance there, only a peace submerged in a deep ocean of emotion. The single string of pearls rolling on her neck appears like a condensed drop of vapor from the southern ocean, or as if fashioned from the stream of separation-tears falling from her eyes, seeming to strive to cool her heat-scorched heart.
* Her tender hand—which was once a snare to bind the deer-like hearts of aesthetes with its playful, graceful gestures—now lies supine on her lap, cold and motionless like a lotus petal struck by frost. Those two hands remain in a gesture of self-surrender to some invisible child—that young cowherd with hair dusted by the sands of Vraja, wearing a peacock-feather crown, and sweet with the nectar of a gentle smile. In her empty lap, that very "Invisible Youth" is perceived through the eye of emotion; He, whose separation is, in truth, the supreme union.
* All around, the fragrance of Sandalwood and the scent of dry Champak flowers spreads, which is, as it were, the perfume of her pure motherly love, devoid of the scent of lust. Thus, that excellent woman, having offered the entire pride of her beauty and youth as a sacrificial oblation into the feet of Sri Krishna—having extinguished the fire of passion and kindled the flame of divine love—shines in the Brindavan of her own heart, sitting in silence like the personification of the penance of separation, longing only for the vision of the child Krishna within.