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    परिश्रम।

    Pooja Prasad Public
    १२/१२/२०२५, ११:२५:२३ पू (12/12/2025, 11:25:23 AM)
    उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
    न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
    इस श्लोक का अर्थ है कि सिर्फ इच्छा करने मात्र से किसी व्यक्ति के काम पूरे नहीं होते, बल्कि इसके लिए मेहनत भी करनी पड़ती है। जिस प्रकार एक सोए हुए शेर के मुंह में हिरण स्वयं नहीं आता, उसे स्वयं ही अपने भोजन के लिए परिश्रम करना पड़ता है।
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    3 comments
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    Akash upraityPublic
    १२/१२/२०२५, १२:२१:३५ अ (12/12/2025, 12:21:35 PM)
    इस श्लोक में परिश्रम का गहरा संदेश है
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    सुमन्तमण्डलःPublic
    १२/१२/२०२५, १२:२७:५४ अ (12/12/2025, 12:27:54 PM)
    गीतायामेव प्रोक्तं भगवता -

    न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
    कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ‌।‌। 3/5 ।।

    अर्थात्, कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। वास्तव में सभी प्राणी प्रकृति द्वारा उत्पन्न तीन गुणों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होते हैं।
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    Ashutosh SamalPublic
    १२/१२/२०२५, १२:२८:१५ अ (12/12/2025, 12:28:15 PM)
    सार्थक
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