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    Prema Shree Public
    १/४/२०२६, ११:५७:३० पू (1/4/2026, 11:57:30 AM)
    दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।
    नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:

     भावार्थ :
    दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहाकभी भी पेट भरने के लिए कपड़े नहीं काटता।

    न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:।
    व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा ॥

     भावार्थ :
    न कोई किसी का मित्र होता है। न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं।

    सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं प्रियम।
    प्रियं च नानृतं ब्रूयात एष धर्म: सनातन: ॥

     भावार्थ :
    सत्य बोलो, प्रिय बोलो,अप्रिय लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।

    यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।
    यत्र तास्तु न पूज्यंते तत्र सर्वाफलक्रियाः ॥

     भावार्थ :
    जहाँ पर हर नारी की पूजा होती है वहां पर देवता भी निवास करते हैं और जहाँ पर नारी की पूजा नहीं होती, वहां पर सभी काम करना व्यर्थ है।
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    2 comments
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    आयुःPrivate
    १/४/२०२६, १:०६:४७ अ (1/4/2026, 1:06:47 PM)
    उत्तमा विचारास्तव।। 'हलन्त्' इति नैव प्रयुज्यते तस्मादल्पा त्रुटिरभूत् ।
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    सुमन्तमण्डलःPublic
    १/४/२०२६, १:५२:१७ अ (1/4/2026, 1:52:17 PM)
    सत्य और सनातन धर्म के सिद्धांतों को दर्शाते ये श्लोक मन को शांति प्रदान करते हैं। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवता:' जैसे विचार समाज के लिए बहुत आवश्यक हैं। शानदार प्रस्तुति!
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