इन्द्रियाणि नियन्तुं न शक्नोम्यहम्।
त्वत्पादसेवायां निरतं कुरु मे मनः
त्वत्प्रेमपूर्णं हृदयं दयां कुरु॥
अर्थ:
मन सदा विषयों की ओर चंचल जाता है,
मैं इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर पाता।
मेरे मन को आपके चरणों की सेवा में निरत करो,
मेरे हृदय को आपके प्रेम से पूर्ण करो, दया करो।