नाहं याचे कदाप्यन्यां देवीं दिव्यां सुरेश्वरीम्॥
एकस्याः चरणाम्भोजध्यानेनैव तृप्तोऽस्म्यहम्।
नान्यस्याः प्राप्तुमिच्छामि ब्रह्मत्वं स्वर्गमेव वा॥
अर्थ: वरदात्री हो या शापदात्री, वही प्रयागवासिनी हो। मैं कभी अन्य दिव्य सुरेश्वरी देवी से याचना नहीं करता। एक के ही चरणकमल के ध्यान से तृप्त हूँ। अन्य से ब्रह्मत्व या स्वर्ग भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं करता।