आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्थासत्योदका धृतिकूला चोर्मियुक्ता ।
तस्यामभिषेकं कुरु पाण्डुपुत्र
न वारिणा शुध्यति चान्तरात्मा ॥
आत्मा रूपी नदी का जल सत्य है, किनारे धैर्य हैं और तीर्थ संयम है; हे पांडुपुत्र! इसी में स्नान करो, क्योंकि अंतरात्मा बाहरी जल से शुद्ध नहीं होती।
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विदुर जी समझाते हैं कि असली तीर्थयात्रा बाहर नहीं, हमारे भीतर है। वे आत्मा की तुलना एक नदी से करते हैं जिसका पावन तट (किनारा) 'धैर्य' है, जिसका जल 'सत्य' है और जिसका पुण्य स्थान (तीर्थ) 'मन का संयम' है। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे पांडुपुत्र, इसी आंतरिक नदी में डुबकी लगाओ (अर्थात अपने आचरण को शुद्ध करो), क्योंकि केवल पानी से शरीर साफ हो सकता है, लेकिन मन और आत्मा को सत्य और संयम ही शुद्ध करते हैं। जीवन का सबक यह है कि जब तक हमारा चरित्र मजबूत नहीं है, तब तक बाहरी दुनिया में मिली कोई भी सफलता हमें शांति नहीं दे सकती।
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The soul is described as a river where the sacred spot is Self-control, the water is Truth, and the banks are Fortitude. Vidura advises that one should bathe in this river of character, for the inner self cannot be cleansed by physical water. The life lesson is: Focus on Internal Hygiene. Just as we wash our bodies daily, we must "wash" our minds with truth and discipline. Resilience (the banks) and Integrity (the water) are what keep our life's river from overflowing into chaos or drying up in despair.
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