अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥
अहिंसा ही परम धर्म, परम तप और परम सत्य है;
क्योंकि अहिंसा से ही धर्म की उत्पत्ति और रक्षा होती है।
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अन्वयः (Anvaya)
अहिंसा परमः धर्मः अस्ति, तथा अहिंसा परं तपः अस्ति। अहिंसा परमं सत्यम् अस्ति, यतः (अहिंसायाः एव) धर्मः प्रवर्तते।
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यह श्लोक 'अहिंसा' को जीवन के उच्चतम आदर्श के रूप में स्थापित करता है। अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा का त्याग नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म से किसी को कष्ट न देना है। इसे सबसे बड़ा धर्म, सबसे बड़ी तपस्या और परम सत्य माना गया है।
जीवन का सबक: क्रोध या प्रतिशोध की भावना से किसी का अहित करना अंततः हमारे स्वयं के धर्म और शांति का विनाश करता है। धैर्य और करुणा के साथ व्यवहार करना ही वास्तविक आध्यात्मिक शक्ति है। जहाँ दया और अहिंसा है, वहीं धर्म निवास करता है।
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This verse defines Ahimsa (Non-violence) as the bedrock of morality. It states that Non-violence is the highest duty, the greatest penance, and the ultimate truth.
The Life Lesson: True power is not found in the ability to cause harm, but in the strength to refrain from it. Ahimsa includes kindness in speech and thoughts. When we operate from a place of non-violence, we align ourselves with the natural law of the universe. Every act of compassion is a step toward fulfilling one's highest purpose.
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