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    Theodore McCarthy Public
    ५/६/२०२६, १२:५४:०५ पू (5/6/2026, 12:54:05 AM)
    नाभावोविद्यते सतः
    सर्वभूतात्म भूतात्म
    भू धातुर् आत्मनः सतः भवनं प्रवर्तते
    यस्य सत्कारात्मपशु कामी तस्य भूतात्मैव पशुः
    यस्य विपर्यय असत्योनिर्सः भवति कामसय अभवे

    मन्ये मनाय तत् चित्ताशुर्गणिताय योगे ॥
    अधिकचित्कणात् सङ्गे चेतित्वा धारयन् मनायकृत्वा धारणां समभितः कामभयलोभद्वेषादयैवमधिकः ।
    आत्म सतः सत्तवाशुः सदेव अपि कति सत्त्वम् । सर्व राजरजोगुण अवगीर्ण -- तद् मम सत्सीम कति राजसुखम् यावत्तमःप्राप्तम्
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    Prema ShreePublic
    ५/६/२०२६, ८:२६:१२ पू (5/6/2026, 8:26:12 AM)
    सत्यस्य अन्वेषणम् एव जीवनम्।
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    Theodore McCarthyPublic
    ५/६/२०२६, ११:२७:४५ पू (5/6/2026, 11:27:45 AM)
    यत्सत्गौणजीवनम् किम् सत्यैव गौणंश्च भूतानाम्?
    यदा सत्यं हि साङ्ख्यानां कदा अन्वेषणान्तम् ऋच्छेत्?
    वा मन्यसे जीवेनसत्यैवकृतम् इत्युक्तम् अतो जीव!
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    KajalPublic
    ५/१३/२०२६, ९:२७:३७ पू (5/13/2026, 9:27:37 AM)
    उत्तमं चिन्तनम्।
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