अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
सोने से बनी लंका भी माँ के सुख के सामने कुछ नहीं है; क्योंकि माँ और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी महान और श्रेष्ठ है।
अन्वयः -
लक्ष्मण! (इयं) लङ्का स्वर्णमयी अपि (अस्ति, तथापि) मे न रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात् अपि गरीयसी (वर्तते)।
संस्कृत-व्याख्या -
जननी - या जन्म ददाति सा माता (The one who gives birth).
स्वर्गादपि गरीयसी - स्वर्गलोकात् अपि महत्तरम् अस्ति (More significant/weightier even than heaven).
भावार्थः -
संसारे सर्वाणि सुखानि वैभवं च एकतः, परन्तु मातुः स्नेहः संरक्षणं च अन्यतः। मातुः स्थानं ब्रह्माण्डे सर्वश्रेष्ठं वर्तते।
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आज 'मातृदिवस' के अवसर पर यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि दुनिया की कोई भी 'सोने की लंका' (धन-दौलत, करियर, आलीशान घर) माँ के आँचल की छाया के सामने तुच्छ है।
माँ एक जीवित स्वर्ग है: हमें स्वर्ग की खोज में भटकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि माँ के चरणों में ही स्वर्ग होता है।
बिना शर्त प्रेम: लंका विजय एक उपलब्धि थी, लेकिन राम के लिए वह अपनी माँ (कौशल्या) और मिट्टी के सामने कुछ भी नहीं थी। यह सिखाता है कि सफलता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह माँ के आशीर्वाद का विकल्प नहीं हो सकती।
जीवन का सबक: माँ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह पहली गुरु और आधार है जिससे हमारा अस्तित्व है। आज का दिन केवल उपहार देने का नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने का है कि हमारे जीवन का हर स्वर्ण-क्षण माँ की तपस्या का फल है।
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On this Mother's Day, this authentic verse serves as the ultimate tribute. It places the "Mother" higher than even the celestial comforts of Heaven.
The Ultimate Destination: We often seek peace and happiness in external achievements (The Golden Lanka), but Rama reminds us that true fulfillment lies in the presence of the Mother.
The Source of Identity: A mother is our first home and our first teacher. No matter how high we fly, it is her ground that holds us.
Life Lesson: Today is a reminder that while the world values us for what we achieve, a mother values us for who we are. Gratitude toward her is the highest form of 'Dharma.' Her love is the only "gold" that never loses its luster.
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