वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह ।
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि ॥
दुर्गम पहाड़ों और जंगलों में पशुओं के साथ भटकना श्रेष्ठ है; परन्तु इन्द्र के महलों में भी मूर्ख लोगों की संगति में रहना उचित नहीं है।
अन्वयः (Anvaya)
पर्वतदुर्गेषु वनचरैः सह भ्रान्तं वरम्, (परन्तु) सुरेन्द्रभवनेषु अपि मूर्खजनसम्पर्कः न (वरम्)।
संस्कृत-व्याख्या (Sanskrit Meaning)
वरम्: श्रेष्ठम्, श्रेयस्करं वा (Better/Preferable).
पर्वतदुर्गेषु: दुर्गमेषु पर्वतेषु (In inaccessible or difficult mountain terrains).
भ्रान्तम्: भ्रमणम् (Wandering).
वनचरैः: वनवासिभिः अथवा पशुभिः सह (With forest dwellers or wild animals).
मूर्खजनसम्पर्कः: अविवेकिभिः जनैः सह संगतिः (Association with foolish/ignorant people).
सुरेन्द्रभवनेषु: इन्द्रस्य प्रासादेषु (Even in the palaces of Indra/Heaven).
भावार्थः
कष्टमयम् अरण्यजीवनं वरम् अस्ति, परन्तु मूर्खैः सह स्वर्गसुखमपि दुःखदायकं भवति।
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भर्तृहरि इस श्लोक में 'संगति' (Company) के महत्त्व पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि कठिन पहाड़ों और दुर्गम जंगलों में जंगली जानवरों या वनवासियों के साथ भटकना कहीं बेहतर है, लेकिन मूर्ख (अविवेकपूर्ण) लोगों के साथ इंद्र के महल (स्वर्ग) में रहना भी स्वीकार्य नहीं है।
यह श्लोक हमें आत्मनिर्भरता और सही चयन की प्रेरणा देता है। गलत लोगों की संगति में मिलने वाला सुख अंततः पतन का कारण बनता है। इससे बेहतर है कि हम अकेले रहें या कठिन परिस्थितियों का सामना करें, लेकिन अपने विवेक और स्वाभिमान से समझौता न करें। आपकी शांति आपके परिवेश की विलासिता में नहीं, बल्कि आपकी संगति की गुणवत्ता में है।
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Bhartrihari provides a radical perspective on Quality of Life. He suggests that wandering in the dangerous, rugged terrains of mountains among wild beasts is better than living in the lap of luxury (Indra's palace) with fools or people devoid of wisdom.
Environment is secondary; company is primary. High-quality surroundings cannot compensate for low-quality companions. Mental and moral friction caused by associating with the ignorant or the toxic is more exhausting than physical hardship. Choose to struggle with integrity rather than thrive in ignorance.
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