कदर्थितस्यापि हि धैर्यवृत्तेःन शक्यते धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम् ।
अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्नेः
नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥
धैर्यवान व्यक्ति को कितना भी सताया जाए, उसके श्रेष्ठ गुणों को मिटाया नहीं जा सकता; जैसे आग को चाहे कितना भी उल्टा कर दें, उसकी लौ हमेशा ऊपर की ओर ही उठती है।
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अन्वयः (Anvaya)
कदर्थितस्य अपि धैर्यवृत्तेः धैर्यगुणाः प्रमाष्टुं न शक्यते। अधोमुखस्य कृतस्य अपि वह्नेः शिखा कदाचित् एव अधः न याति।
संस्कृत-व्याख्या (Sanskrit Meaning)
कदर्थितस्य: अपमानितस्य अथवा कष्टे पतितस्य (Of one who is oppressed or fallen into distress).
धैर्यवृत्तेः: धीरपुरुषस्य (Of a person of fortitude).
प्रमाष्टुम्: विनाशयितुम् (To wipe out/destroy).
वह्नेः: अग्नेः (Of fire).
अधोमुखस्य: नीचैः कृतस्य (Turned downwards).
शिखा: ज्वाला (The flame).
भावार्थः
यथा कश्चित् दीपं अधोमुखं करोति चेदपि तस्य ज्वाला उपरि एव गच्छति, तथैव धीरपुरुषस्य उपरि कियन्तः अपि कष्टाः आगच्छन्तु, तस्य श्रेष्ठगुणाः न नश्यन्ति।
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यह श्लोक 'आत्म-सम्मान' और 'अटल स्वभाव' की अद्भुत प्रेरणा देता है।
भर्तृहरि कहते हैं कि एक धैर्यवान और चरित्रवान व्यक्ति को चाहे कितना भी प्रताड़ित किया जाए या उसे बुरे वक्त में धकेल दिया जाए, उसके श्रेष्ठ गुणों को नष्ट नहीं किया जा सकता।
जैसे—यदि आप जलती हुई मशाल या दीपक को उल्टा भी कर दें, तो भी उसकी लौ (Flame) कभी नीचे की ओर नहीं जाती, वह हमेशा ऊपर की ओर ही उठती है।
जीवन का सबक: आपकी परिस्थितियाँ आपको नीचे गिरा सकती हैं, लेकिन आपका चरित्र और आपका साहस आपकी अपनी संपत्ति है। दुनिया आपको 'अधोमुख' (नीचा दिखाना) कर सकती है, लेकिन आपकी महानता की 'लौ' हमेशा ऊपर की ओर ही संकेत करेगी। संकट के समय भी अपनी गरिमा न छोड़ना ही असली 'धैर्य' है।
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This verse is a magnificent metaphor for Innate Greatness.
Bhartrihari states that even if a person of fortitude is oppressed or humiliated, their inherent virtues cannot be erased.
He gives the example of Fire: Even if you turn a torch upside down, the flame will never point downwards; it always rises toward the sky.
The Life Lesson: Your essence is independent of your status. People or circumstances might try to "turn you upside down" or diminish your value, but if you have cultivated inner strength and character, you will instinctively rise. True caliber is like fire—its natural direction is always upward.
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