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निर्भासासविस्मय किं कर्तुम् इह इति स्वं पृच्छामि
सत्यॆ चॆतति मम आत्म न । यद्गिर् तद्भावन ह । आत्म सत्यॆ चित्तम् किमपि कस्य सम्भावात् चित्तात् वा वृत्तिसम्भवः -- अपि चित्तॆनस्म्यपि मम चित्तॆ सत्य न--अति गम्भीरॊऽपि भुमिः तथॊऽप्यभुमिकॆ? मम भावना मम विश्वॆति Schopenhauer "Die Welt als Wille und Vorstellung" "किम् जगत् ? तत् धृतिश्चभावना"
> खलु प्रशंसनीयम्
आम् @कजल् कृपया क्षमास्तु--मम लवनजलम् भवत्यॊऽपङ्कतिशुद्धत्वाम्भाविव लीयताम् | तदपि मम अनुवाद Schopenhauer इति अर्थॊ मम असूयैवं भवत्यॊ न मृष्टॊऽस्ति अधरॆन -- लीययिष्टदॆवतप्रमुखाय ।