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    Kajal Public
    ५/१४/२०२६, ११:०१:२३ पू (5/14/2026, 11:01:23 AM)
    गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति,
    ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।
    सुस्वादुतोयाः प्रभवन्ति नद्यः,
    समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः॥
    --------------------
    अर्थ: गुण जब तक गुणी (अच्छे) व्यक्तियों के पास रहते हैं, तब तक वे गुण ही रहते हैं। परन्तु जब वही गुण किसी निर्गुण (बुरे या गुणहीन) व्यक्ति के पास चले जाते हैं, तो वे दोष (बुराई) बन जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे नदियाँ जब तक बहती हैं, उनका जल बहुत मीठा और स्वादिष्ट होता है, लेकिन समुद्र (खारे पानी) में मिलते ही उनका जल पीने लायक नहीं रहता।

    #Sanskrit 
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    Theodore McCarthyPublic
    ५/१४/२०२६, २:३१:४९ अ (5/14/2026, 2:31:49 PM)
    च अद्यतनकाल अपि लघुदीपकमद्यॆ
    निर्भासासविस्मय किं कर्तुम् इह इति स्वं पृच्छामि
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    KajalPublic
    ५/१४/२०२६, ३:२५:३८ अ (5/14/2026, 3:25:38 PM)
    भवतः विचारः अतीव गम्भीरः अस्ति। भवतः आत्मचिन्तनं प्रणमामि।
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    सुमन्तमण्डलःPublic
    ५/१४/२०२६, ३:२७:५९ अ (5/14/2026, 3:27:59 PM)
    सत्यमुक्तं भवता। अद्यतनकाले अपि एषा पुरातनी विद्या अस्माकं कृते मार्गदर्शिका अस्ति। संसर्गानुसारं गुणाः परिवर्तन्ते इति तु शाश्वतं सत्यम्। भवतः चिन्तनं खलु प्रशंसनीयम्।
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    Theodore McCarthyPublic
    ५/१४/२०२६, ८:३१:३६ अ (5/14/2026, 8:31:36 PM)
    @vyakti_696e3e2fa7a4d
    सत्यॆ चॆतति मम आत्म न । यद्गिर् तद्भावन ह । आत्म सत्यॆ चित्तम् किमपि कस्य सम्भावात् चित्तात् वा वृत्तिसम्भवः -- अपि चित्तॆनस्म्यपि मम चित्तॆ सत्य न--अति गम्भीरॊऽपि भुमिः तथॊऽप्यभुमिकॆ? मम भावना मम विश्वॆति Schopenhauer "Die Welt als Wille und Vorstellung" "किम् जगत् ? तत् धृतिश्चभावना"
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    Theodore McCarthyPublic
    ५/१४/२०२६, ८:४६:२१ अ (5/14/2026, 8:46:21 PM)
    @sanskrit_sumanta परवाद्यपि भवन् यदुक्तॊ मम चिन्ता अनुवादी
    > खलु प्रशंसनीयम्
    आम् @कजल् कृपया क्षमास्तु--मम लवनजलम् भवत्यॊऽपङ्कतिशुद्धत्वाम्भाविव लीयताम् | तदपि मम अनुवाद Schopenhauer इति अर्थॊ मम असूयैवं भवत्यॊ न मृष्टॊऽस्ति अधरॆन -- लीययिष्टदॆवतप्रमुखाय ।
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    Prema ShreePublic
    ५/१६/२०२६, ७:००:४८ पू (5/16/2026, 7:00:48 AM)
    नदीजलस्य दृष्टान्तः समीचीनः।
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