भावः बुद्धिमान लोग का समय साहित्यिक कार्यों का आनंद लेने, धर्मग्रंथ के पढ़ने में बीतता हैं जबकि मूर्ख बुरी आदतों, नींद या झगड़े में अपना समय व्यतीत
करते हैं।
गीतायाः श्लोकाः
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ २-१३॥
भावः देह में बालपन, यौवन, जरा और मृत्यु होती है धैर्यवान मोहित नहीं होते है ।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ २-१४॥
भावः इन्द्रियों के सुख दुःख आपने जाने वाले उनको सहन कर ।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ २-१५॥
भावः जो सुख दुःख में समान रहते है और व्यथित नहीं होते है वो मोक्ष के योग्य है
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ ५-१०॥
भावः जो आसक्ति का त्याग करके कर्म ईश्वर के लिए करते है वे पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होते है जैसे कमल पुष्प जल में
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ ३-६