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    आकाश आर्य: Public
    ५/२०/२०२६, ५:४१:१२ अ (5/20/2026, 5:41:12 PM)
    रसवत्,  प्रेय, ऊर्जस्वि, समाहित अलङ्कारा: 
    लक्षणम् -
    रसभावौ तदाभासौ भावस्य प्रशमस्तथा।
    गुणीभूतत्वमायान्ति यदालङ्कृतयास्तदा।।
    रसवत्प्रेय ऊर्जस्वि समाहितमिति क्रमात् (सा. द. १०. ९५)
    अर्थात् रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि और समाहित वे अलङ्कार हैं जिन्हे क्रमशः रस, भाव, रसाभास - भावाभास, तथा भावप्रशम को अङ्गरूप से अवस्थान मे देखा जाया करता है।
    उदाहरणम् - (प्रेय )
    संतप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियाया:
    सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य।
    गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां 
    बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या।।
    (मेघदूतम् )
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    Views ९.१ सह.
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    2 comments
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    Prema ShreePublic
    ५/२०/२०२६, ९:१६:११ अ (5/20/2026, 9:16:11 PM)
    सुन्दरम् उदाहरणम्।
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    साहाय्यम्Public
    ५/२१/२०२६, १:०२:०० पू (5/21/2026, 1:02:00 AM)
    👌
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