तत्प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् ॥
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः ।
कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं पयः ॥
ललाट पर लिखा धन मरुस्थल में भी मिलता है, पर सोने के मेरु पर्वत पर भी उससे अधिक नहीं मिलता; इसलिए धीर बनो और धनवानों के आगे दीन मत बनो, घड़ा कुएँ और समंदर दोनों जगह बराबर ही जल लेता है।
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अन्वयः (Anvaya)
धात्रा निजभालपट्टलिखितं यत् स्तोकम् महद्वा धनम् (अस्ति), तत् मरुस्थले अपि नितराम् प्राप्नोति, मेरौ (अपि) ततः अधिकम् न (प्राप्नोति)। तत् (तस्मात्) धीरः भव, वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः। पश्य, कूपे पयोनिधौ अपि घटो तुल्यं पयः गृह्णाति।
पद-विच्छेद एवं व्याकरण-संकेत (Vocabulary & Grammar)
निज-भाल-पट्ट-लिखितम्: अपने ललाट रूपी पट्ट पर लिखा हुआ।
नितराम्: निश्चित रूप से, पूरी तरह से (Infallibly / Entirely).
मेरौ: सुवर्ण पर्वत 'मेरु' पर जाने पर भी (Even on the golden Mount Meru).
तद्धीरो भव (तत् + धीरः): इसलिए धैर्यवान बनो।
वित्तवत्सु: धनवानों के सामने (In front of the wealthy).
कृपणां वृत्तिम्: दीनतापूर्ण व्यवहार, गिड़गिड़ाहट (Pleading/miserable attitude).
वृथा मा कृथाः: व्यर्थ में मत करो (मा के योग में लुङ् लकार - आङ्गल भाषा में 'Do not make').
पयोनिधौ (पयः + निधौ): समुद्र में (In the ocean).
तुल्यं पयः: बराबर मात्रा में जल।
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भर्तृहरि इस मूल श्लोक में दो विपरीत छोरों की तुलना करके बात को चरम तक ले जाते हैं:
मरुस्थल बनाम मेरु: विधाता ने हमारी पात्रता और कर्म के अनुसार जो थोड़ा या बहुत धन हमारे भाग्य में लिख दिया है, वह हमें 'मरुस्थल' (संसाधनहीन जगह) में भी निश्चित रूप से मिल जाएगा; और यदि हम 'मेरु पर्वत' (जो स्वयं सोने का माना जाता है) पर भी चले जाएँ, तो भी उससे एक दाना अधिक नहीं मिलेगा।
वृत्ति का सुधार: जब बाहरी परिस्थितियाँ आपके आंतरिक भाग्य या पात्रता को बदल नहीं सकतीं, तो फिर धनवानों के सामने व्यर्थ में दीन मत बनो, गिड़गिड़ाओ मत। अपने भीतर 'धीर' (धैर्य और आत्मसम्मान) को जगाओ।
कूप और पयोनिधि: घड़ा चाहे कुएँ के अल्प जल में डाला जाए या अथाह समुद्र में, वह अपनी क्षमता के अनुसार दोनों ही जगह 'तुल्य' (बराबर) जल ही ग्रहण करेगा।
जीवन का सबक: यह श्लोक अकर्मण्यता नहीं सिखाता, बल्कि यह याचक-वृत्ति (Begging mindset) पर प्रहार करता है। जब बाज़ार (Market) या कोई अमीर व्यक्ति आपकी क्षमता से अधिक आपको दे ही नहीं सकता, तो उनके सामने झुकना क्यों? अपनी योग्यता और आत्मसम्मान को इतना ऊंचा कर लीजिए कि आप जहाँ खड़े हों, वहीं आपका 'मरुस्थल' भी 'मेरु' बन जाए।
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This complete textual variant sharpens the philosophical contrast to its absolute peak:
2. The Desert vs. The Golden Mountain: Whatever fortune is inscribed on your forehead by the Creator—be it meager or magnificent—you will receive it even in a barren desert. Conversely, even if you scale Mount Meru (the mythical mountain of solid gold), you will not receive a single fraction more than what your capacity dictates.
2. The Call to Dignity: Therefore, be centered and courageous (Dhira). Do not adopt a miserable, pleading attitude (Kṛpaṇāṃ vṛttim) before the wealthy. It is completely futile.
3. The Well and the Ocean: Observe the clay pot—whether it is lowered into a narrow water-well or into the boundless ocean (Payonidhi), it receives the exact same (Tulya) amount of water, limited only by its own volume.
The Life Lesson: Bhartrihari is delivering an intense psychological intervention against sycophancy and desperation. The external world cannot reward you beyond your structural readiness. Stop expecting external entities or powerful mentors to magically elevate you while you remain unchanged. Expand your intellect, focus on your internal growth, and carry yourself with unshakable dignity.