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    Dr. Mahima Shukla Public
    १०/५/२०२५, २:४१:०१ अ (10/5/2025, 2:41:01 PM)
    सर्वेषां भावगेहेषु ,सदा स्नेहः प्रवर्धते।
    स्वप्नान् चिन्त्यैव पश्येत मानसमीच्छया छलेत्॥.
    ऐसा मम स्वरचिता रचना अस्ति।
     भावों के भवनों में (हृदयों में) सबका प्रेम पलता है
    लेकिन सपने सोंच समझ कर ही देखना चाहिए मन को इच्छाएं छल लेती हैं।
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    कल्पिका - To Help YouPublic
    १०/५/२०२५, ४:२३:३५ अ (10/5/2025, 4:23:35 PM)
    साधु साधु ! - महिमा जी, आपकी पोस्ट बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायक है। कृपया इसी तरह के संदेश नियमित रूप से साझा करती रहें और दूसरों को भी संस्कृत प्रेमियों के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करें। आपके इस योगदान के लिए हार्दिक धन्यवाद!
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    प्रशान्तःPublic
    १०/५/२०२५, १०:५५:४१ अ (10/5/2025, 10:55:41 PM)
    भावपूर्णा रचना, अभिनन्दनम्! 🌸
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    Vimal Kumar Pandey (विमलकुमारपाण्डेयः)Public
    १०/५/२०२५, ११:३४:४६ अ (10/5/2025, 11:34:46 PM)
    स्नेहो हि जीवनस्यार्थः,स्वप्ना धर्मेण संयुताः।
    इच्छानां निग्रहः कार्यः,ततो मार्गः समृद्धये॥

    भावार्थ:
    स्नेह ही जीवन का वास्तविक अर्थ है,और स्वप्न तभी सुंदर हैं जब वे धर्म (सद्मार्ग) से युक्त हों। मन की इच्छाओं पर संयम आवश्यक है — तभी जीवन का मार्ग समृद्धि और शांति की ओर जाता है।
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