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    Dr. Mahima Shukla Public
    १०/८/२०२५, १०:१९:५७ अ (10/8/2025, 10:19:57 PM)
    प्रभाताभिलाषः(सत्यान्वेषणम्)

    गीतानि खिन्नानि हि, छन्दसि विह्वलानि।
    रागिण्यः शिथिलाः सदा, रागा दासत्वमागताः॥१॥
    निशि दिवं जगराम्यहम्, शशिनि चकोरवदिच्छया।
    निशिचरपदयोः कृतं, प्रभातमभ्यर्थयेऽनिशम्॥२॥
    आसीदभिलाष एव मे, कलिकां तितलाभ्यः प्रदातुमहम्।
    अश्रुपूरितपालिकां, नयनोत्सवकृत्सु वहन्तुमहम्॥३॥
    ऋतवः पुनर्बहवः पतिताः, वने बहुलाः पराजिताः।
    वसन्तमवाप्तुमिच्छिताः, परं विधिना निरोध्यते॥४॥
    किं भाग्यमलिखितं नु को, लिलेख तदपाकर्तुमीशते।
    सलिलबिन्दुरिव सिन्धुषु, स्वयमेव लीयते नियतम्॥५॥
    कः खलु जनो न दुःखितः, न च वेद शोके स्थिरम्।
    कः खलु रविर्न दग्धवान्, न चलितमार्गोऽपि॥६॥
    देहः प्राणश्च चेतना, कल्पनैव केवलं सदा।
    शूलपथेषु पुष्पकं, विमृशामहे वयं पुनः॥७॥
    सत्यनिमेषसंकटे, सृजति विनाशमप्यथ।
    शान्तसलिलसिन्धुषु, लहरीमन्विच्छामहे॥८॥

    गीत अब खिन्न हो गए हैं,
    छंद (काव्य) व्याकुल से प्रतीत होते हैं।
    रागिणियाँ (गायिकाएँ/वाद्यध्वनियाँ) शिथिल हो गई हैं,
    और राग मानो दासत्व को प्राप्त हो गए हैं।
    मैं रातभर आकाश को निहारता रहता हूँ,
    चकोर की भाँति चाँद की अभिलाषा करता हूँ।
    रात्रि के अंधकारमय पदचिह्नों के बीच ही,
    मैं सदा प्रभात का आह्वान करता रहता हूँ।
    मेरी केवल यही अभिलाषा रही,
    कि मैं कलियों को तितलियों को अर्पित करूँ।
    आँसुओं से भरे पात्र को,
    आँखों के उत्सव में ले जाकर समर्पित कर दूँ।
    ऋतुएँ अनेक बार बीत चुकीं,
    वनों की बहुलता भी हार चुकी।
    वसन्त को प्राप्त करने की चाह बनी रही,
    किन्तु विधि ने उसे रोक रखा।
    भाग्य में क्या लिखा गया है,
    और कौन है जो उसे मिटा सके?
    जैसे जल की बूँद सागर में
    नियत रूप से स्वयं लीन हो जाती है।
    कौन मनुष्य ऐसा है जो दुःखी न हो?
    कौन है जो शोक को स्थिरता से न जानता हो?
    कौन सा सूर्य ऐसा है जिसने दग्ध न किया?
    कौन सा मार्ग ऐसा है जो अचल रहा हो?
    देह, प्राण और चेतना —
    ये सदा केवल कल्पना ही हैं।
    काँटों के पथ पर फूलों की खोज करना,
    हम बार-बार यही सोचते रहते हैं।
    सत्य की पलक-झपक में ही
    विनाश भी उत्पन्न हो जाता है।
    शांत जलराशि वाले सागर में भी
    हम लहर की खोज करते रहते हैं।
    डॉ महिमा शक्ला
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    3 comments
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    सुमन्तमण्डलःPublic
    १०/९/२०२५, ७:४०:१७ पू (10/9/2025, 7:40:17 AM)
    सारसम्पन्ना लेखा।
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    आकाश कुमार | Akash KumarPublic
    १०/९/२०२५, ११:११:१३ पू (10/9/2025, 11:11:13 AM)
    बेहद उपयोगी और स्पष्ट
    DislikeCommentDelete
    Profile pic
    Akash upraityPublic
    १०/९/२०२५, १:४२:४९ अ (10/9/2025, 1:42:49 PM)
    उपयोगी
    DislikeCommentDelete
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